
*संतों का सम्मान कर अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज ने किया तीन दिवसीय कार्यक्रम का समापन.
- उज्जैन को पवित्र नगरी घोषित करने की उठी मांग!!
उज्जैन . दिनांक 22 अप्रैल 2026 को सायं काल 6 बजे अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज ने स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज के आश्रम समन्वय निलियम में संतों का सम्मान कर तीन दिवसीय कार्यक्रम का समापन किया।
आद्य शंकराचार्य जयंती एवं भगवान परशुराम जयंती के पावन अवसर पर तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन अवसर पर अखिल भारतीय ब्राम्हण समाज के राष्ट्रीय महामंत्री श्री तरूण उपाध्याय एवं महाकाल मंदिर समिति के सदस्य श्री राजेन्द्र शर्मा गुरू शंकराचार्य जयंती समारोह के संयोजक त्रिशूल शिवगण वाहिनी क़े संस्थापक आदित्य नागर ने शाल भेंटकर संतों का सम्मान किया।
संत सम्मान समारोह में जूना अखाडा के महामण्डलेश्वर स्वामी श्री शैलेषानन्द जी गिरि महाराज, निरंजनी अखाडा के महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रेमानन्द जी गिरि महाराज, जूना अखाडा के महन्त स्वामी श्री निलेशानन्द जी महाराज, निरंजनी अखाडा के स्वामी श्री ओमानन्द जी सरस्वती महाराज तथा महाकाल मंदिर के मुख्य पुजारी पं. रमन त्रिवेदी का शाॅल श्रीफल तथा पुष्पहारों से सम्मान किया गया।
सम्मान समारोह के अवसर पर अपने आशीर्वचनों में जूना अखाडा के महामण्डलेश्वर स्वामी श्री शैलेषानन्द जी गिरि महाराज ने कहा कि दक्षिण भारत के केरल राज्य में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ, भारतीय प्राच्य परम्परा में शंकराचार्य जी को शिव का अवतार स्वीकार किया है। शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे। उन्हें सनातन धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिन्दू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ कियाए तो दूसरी तरफ उन्होने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया।
निरंजनी अखाडा के महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रेमानन्द जी गिरि महाराज ने कहा कि परशुराम जी त्रेता युग में एक ब्राह्मण ऋषि के यहाँ जन्मे थे। जो विष्णु के छटे अवतार माने जाते हैं। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्यप्रदेश के इन्दौर जिला में ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत में हुआ। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं। रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर वे क्रोधान्ध हो “सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा” तक कह डाला। तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए “अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता” तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस में भी कहा है कि “कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू”। त्रिशूल शिवगण वाहिनी के संस्थापक आदित्य नागर ने अपने उद्बोधन में बताया कि भगवान शंकराचार्य विश्व बंधुत्व और शांति के प्रवर्तक रहे. उन्होंने उज्जैन में सिंहस्थ पर्व को ध्यान में रखते हुए उज्जैन को पवित्र नगरी घोषित करने तथा मांस और मदिरा का सेवन करने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों से
उज्जैन नगरी में मांस मदिरा का सेवन न करने का आवाहन किया. सभी उपस्थित संत समाज और प्रवृत्ति जनों ने इस मांग का समर्थन किया और उज्जैन को पवित्र में भी घोषित करने का आवाहन किया.
इस अवसर पर अखिल भारतीय ब्राम्हण समाज के तरूण उपाध्याय, राजेन्द्र शर्मा गुरूजी, शैलेन्द्र द्विवेदी, दिनेश रावल स्वामी दिलमिलाके, रामेश्वर जोशी, वीरेन्द्र त्रिवेदी, रमाकान्त शर्मा, शैलेष दुबे, अरूण शर्मा, अरविन्द जोशी, राजकुमार जोशी, अजयप्रकाश मेहता, संजय चतुर्वेदी, गोपाल त्रिवेदी, मुकेश व्यास, दिलीप नागर, मुन्नीलाल शर्मा, किरण कान्त मेहता, दिप्तेष रावल, शिरीष दुबे, दीपक शर्मा, अमरीष शुक्ला, अनिल जोशी, हेमन्त दुबे, जमनालाल शर्मा, प्राणेष शुक्ला, उमेश शकरगाये, देेवेन्द्र व्यास, निपुण पालीवाल, विनोद मेहता, श्रीमती सुकीर्ति व्यास, श्रीमती नम्रता उपाध्याय, श्रीमती रत्ना व्यास, श्रीमती गायत्री शुक्ला, श्रीमती हेमा व्यास आदि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन शैलेष दुबे ने किया तथा आभार प्रदर्शन शैलेन्द्र व्यास स्वामी मुस्कुराके ने माना*


